तो अच्छा था
जो परदा रहा था आधा
वो अच्छा था
दिन कमाल थे
कहते नहीं थे कैसे
मीरा के साल थे
याद है कैसे गुंचों में बसे थे हम
हर शख़्स था अपना
कुछ यूं रहे थे हम
दिन गुज़र गये औ रातें निकल गईं
बंद थी जो अब तक वो कली खिल गई
फूल की किस्मत थी वो या
कुछ बात थी उसमें
‘वो’ आई देखने
कि क्या ख़ास है इसमें
सोचता रहा मैं के क्या करेगी ‘वो’
देख लिया अब जो
तो क्या कहेगी ‘वो’
देख पाई ‘वो’ जो मैं देखने ना पाया
चेहरा मेरा था जांचा
मैं जांचने ना पाया
कहती चली गई वो
कुछ नया ना है है पुराना
सूरत तो तुम अपनी
ख़ुद को भी ना दिखाना
मान गया मै बातें
जान के भी अब तो
सूरत मेरी है गायब
दो – चार सौ दिन को
“निकाल दो हमको क्या काम अब है करना”
Interesting है ये मेरे आईने का कहना
दिन गुज़र गये औ रातें निकल गईं
चल रहीं थीं जैसी चलती चली गईं
खलने लगा यूं जब
खालीपन ये अपना
चाहने लगा कुछ
जिसे देर तक हो तकना
चाह में इसकी
खिड़की जो खुल गई
‘वो’ खड़ी वहां पर
इत्तफ़ाकन मिल गई
छिपा रहा था चेहरा
ख़म-ए-गेसूओं के साये में
अब हट चुके थे गेसू
उस चेहरा-ए-साये से
आईना वो मेरा
मुझसे ही मुड़ गया
‘अजनबी’ की तरफ़ झांका
जा कर के जुड़ गया…….
( कविता अधूरी है..... पूरी करने का मन नहीं है....)
--- सुधीर राणा
(गुंचे=blossom or flower bud) (ख़म=Curls of the hair)









